Sunday, 19 November 2017

mere chacha

चाचा ...

ये शब्द मेरे लिए लाड़ का ही समरूप है , सिर्फ लाड़, बिना किसी अपेक्षा, ज़िम्मेदारी के...
आज बहुत कुछ लिखने का मन है मेरे चाचा , गुड़्डू चाचा के लिए

हमारे बचपन की एक एक याद, एक एक पल में हैं चाचा।  चाचा और उनके साथ स्टैनली चाचा और मुकेश चाचा.... जब से आँख खुली तब से
सुबह  इन्ही की आवाज़ों से शुरू होती थी और रात इन्ही की हंसी से, आनंदनगर की बल्ब की रौशनी में। ...
ये वो बाँहें थी जो हमारे हाथ फ़ैलाने पर हमेशा गोद  लेने को तैयार रहती थीं :)

मम्मी पापा तो रहते थे पर वो चाचा ही थे जो हमारे साथ खेलते थे, डाँटते भी थे, और हम लोगों की हर बात मानते भी थे
एक बार हाथ में फ्रैक्चर होने के बाद आ के हमारी ज़िद के लिए उसी टूटे हाथ से  खेले फिर बोले देखो तुमने इतने कस के मारा की हमारा हाथ ही टूट गया और हम खुश हो गए  कि हमने चाचा को हरा दिया
ऐसे थे मेरे चाचा। ... हैं...

फिर हम  सब तो बड़े गए, चाचा वैसे ही रहे हमेशा
हमेशा बच्चो के कमरे में रहना जब सब इकठ्ठा हों , संजय दादा के साथ बियर पीना बस, रिंकी दी  टिंकू दी के साथ मज़ाक , ऐसे मेरे गुडडू चाचा

 और सबसे मज़ेदार बात कि हमारे बच्चो के लिए भी आप वैसे ही रहे
चाहे सेरा, कोको या अनय
अनय के तो गुंडास्वामी हैं आप
नन्नू भी कितने मज़े से गोदी में थी नितिन की शादी में

वैसे ही एक बार फिर देखने का मन है
बहुत कुछ अधूरा रह गया है

अब बस इंतज़ार है कि जैसे आपको एक बार डोसा  बना के खिलाया फिर  खिलाऊ ...
पक्का वादा।।।

till we meet again... love you chacha...

from all of us....

No comments:

Post a Comment